Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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इस भाँति तीन वर्ष निकल गये। विप्रजी महाराज ने एक बार भी तकाजा न
किया। वह चतुर शिकारी की भाँति अचूक निशाना लगाना चाहते थे। पहले से
शिकार को चौंकाना उनकी नीति के विरुद्ध था।
एक दिन पंडितजी ने शंकर को बुलाकर हिसाब दिखाया। ६०) जो जमा थे वह
मिनहा करने पर अब भी शंकर के जिम्मे १२०) निकले।
शंकर-इतने रुपये तो उसी जन्म में दूँगा, इस जन्म में नहीं हो सकते।
विप्र-मैं इसी जन्म में लूँगा। मूल न सही, सूद तो देना ही पड़ेगा।
शंकर-एक बैल है, वह ले लीजिए; एक झोपड़ी है, वह ले लीजिए और मेरे
पास रखा क्या है?
९ विप्र-मुझे बैल-बधिया लेकर क्या करना है। मुझे देने को तुम्हारे
पास बहुत कुछ है।
शंकर-और क्या है महाराज?
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