Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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गया बड़ी मुश्किल से राजी हुआ। वह ठहरा टके का मजदूर, मैं एक बड़ा
अफसर। हमारा और उसका क्या जोड़। बेचारा झेंप रहा था, लेकिन मुझे भी
कुछ कम झेंप न थी; इसलिए नहीं कि मैं गया के साथ खेलने जा रहा था
बल्कि इसलिए कि लोग इस खेल को अजूबा समझकर इसका तमाशा बना लेंगे और
अच्छी खासी भीड़ लग जायगी। उस भीड़ में वह आनन्द कहाँ रहेगा; पर
खेले बगैर तो रहा नहीं जाता था। आखिर निश्चय हुआ कि दोनों जनें
बस्ती से बहुत दूर एकान्त में जाकर खेलें। वहाँ कौन कोई देखनेवाला
बैठा होगा। मजे से खेलेंगे और बचपन की उस मिठाई को खूब रस ले-लेकर
खायेंगे। मै गया को लेकर डाक बँगले पर आया और मोटर में बैठकर दोनों
मैदान की ओर चले। साथ में एक कुल्हाड़ी ले लो। मैं गंभीर भाव धारण
किये हुए था। लेकिन गया इसे अभी तक मजाक ही समझ रहा था। फिर भी उसके
मुख पर उत्सुकता या आनन्द का कोई चिन्ह न था। शायद वह हम दोनों में
जो अन्तर हो गया था, वही सोचने में मगन था।
मैने पूछा-तुम्हें कभी हमारी याद आती थी गया? सच कहना।
गया झेंपता हुआ बोला-मैं आपको क्या याद करता हुजूर, किस लायक हूँ।
भाग में आपके साथ कुछ दिन खेलना बदा था, नहीं मेरी क्या गिनती।
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