Buch · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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यह कहकर बेगम साहबा झल्लायी हुयी दीवानखाने की तरफ चली। मिर्जा
बेचारे का रंग उड़ गया। बीबी की मिन्नतें करने लगे-'खुदा के लिए,
तुम्हें हजरत हुसेन की कसम। मेरो ही मैयत देखे, जो उधर जाय! लेकिन
बेगम ने एक न मानी। दीवानखाने के द्वार तक मूयी पर एका-एक पर-पुरुषः
के सामने जाते हुए पाँव बँध-से गये। भीतर झाँका। संयोग से कमरा खाली
था। मीर साहब ने दो एक मुहरे इधर-उधर कर दिये थे, और अपनी सफाई
जताने के लिए बाहर टहल रहे थे। फिर क्या था, बेगम ने अंदर पहुँचकर
बाजी उलट दी; मुहरे कुछ तख्त के नीचे फेंक दिये, कुछ बाहर; और
किवाड़े अन्दर से बन्द करके कुण्डी लगा दी। मीर साहब दरवाजे पर तो
थे ही, मुहरे बाहर फेंके जाते देखे, चूड़ियों की भनक भी कान में
पड़ी। फिर दरवाजा बन्द हुआ, तो समझ गये, बेगम साहबा बिगड़ गयीं।
चुपके से घर की राह ली।
मिर्जा ने कहा--तुमने ग़ज़ब किया!
बेगम--अब मीर साहब इधर आये, तो खड़े-खड़े निकलवा दूॅगी। इतना लौ
खुदा से लमाते, तो क्या गरीब हो जाते! आप तो शतरंज खेलें, और मै
यहाँ चूल्हे-चक्की की फ़िक्र में सिर खपाऊँ! ले जाते हो हकीम साहब
के यहाँ कि अब भी ताम्मुल है?
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