Buch · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Seite 164 von 251
Autor: प्रेमचंद
Zeit0:00
Tempo (WPM)0.0
Genauigkeit100.0%
Start drücken und den Text exakt schreiben. · Rucktaste deaktiviert — auch bei Fehlern weitertippen.
इसके सिवा और कोई दूसरी अभिलाषा न थी। अगर मुझे मालूम होता कि मेरी
काश्मीर-यात्रा इतनी महंँगी पड़ेगी, तो उधर जाने का नाम न लेता। उसे
बचाने के लिए मुझसे जो कुछ हो सकता था, वह मैने सब किया, किन्तु
बुखार टायफायड था, उसकी जान लेकर ही उतरा। उसके जीवन के स्वप्न मेरे
लिए किसी ऋषि के आशीर्वाद बनकर मुझे प्रोत्साहित करने लगे और यह उसी
का शुभ फल है कि आज आप मुझे इस दशा में देख रहे हैं। मोहन की
बाल-अभिलाषाओं को प्रत्यक्ष रूप में लाकर मुझे यह संतोष होता है कि
शायद उसकी पवित्र आत्मा मुझे देखकर प्रसन्न होती हो। यही प्रेरणा थी
कि जिसने कठिन-से-कठिन परीक्षाओं में भी मेरा बेड़ा पार लगाया नहीं
तो मै आज भी वही मंद-बुद्धि सूर्यप्रकाश हूँ, जिसकी सूरत से आप
चिढ़ते थे।'
उस दिन से मैं कई बार सूर्यप्रकाश से मिल चुका हूँ। वह जब इस तरफ आ
जाता है, तो बिना मुझसे मिले नहीं जाता है। मोहन को अब भी वह अपना
इष्टदेव समझता है। मानव-प्रकृति का यह एक ऐसा रहस्य है, जिसे मैं आज
तक नहीं समझ सका।
← सवा सेर गेहूँ प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ (1950) द्वारा
प्रेमचंद लाॅटरी →
74156 प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ 1950 प्रेमचंद
Start drücken und den Text exakt schreiben.
Nicht gestartet