كتاب · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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المؤلف: प्रेमचंद
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उधर नौकरों में भी काना-फूसी हो लगी। अब तक दिन-भर पड़े-पड़े
मक्खियाँ मारा करते थे। घर में चाहे कोई आवे, चाहे कोई जाय, उनसे
गुछ मतलब न था। आठों पहर की धौंस हो गयी। कभी पान लाने का हुक्म
होता, कभी मिठाई का। और हुक्का तो किसी प्रेमी के हृदय की भॉति
नित्य जलता ही रहता था। वे बेगम साहबा से जा-जाकर कहते-हुजूर, मियाँ
की शतरंज तो हमारे जी का जंजाल हो गयी! दिन-भर दौड़ते-दौड़ते पैरों
में छाले पड़ गये। यह भी कोई खेल है कि सुबह को बैठे, तो शाम ही कर
दी! घड़ी-आध-घड़ी दिल-बहलाव के लिए खेल लेना बहुत है। खैर, हमें तो
कोई शिकायत नहीं; हुजूर के गुलाम हैं, जो हुक्म होगा बजा ही
लावेंगे; मगर यह खेल मनहूस है। इसका खेलनेवाला कभी पनपता नहीं; घर
पर कोई-न-कोई आफ़त जरूर आती है। यहाँ तक कि एक के पीछे महल्ले
के-महल्ले तबाह होते देखे गये है। सारे महल्ले में यही चर्चा होती
रहती है। हुजूर का नमक खाते हैं, अपने आका की बुराई सुन-सुनकर रंज
होता है। मगर क्या करें! इस पर बेगम साहबा कहतीं-मैं तो खुद इसको
पसन्द नहीं करती। पर वहा किसी की सुनते ही नहीं क्या किया जाय!
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